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भूखे पेट ही काम


लाजो आज घर से भूखे पेट ही काम पर निकली थी. कल शाम बंगलों से मिले बचे-खुचे भोजन को उसने सुबह बच्चों की थाली में डाल दिया था.
लाजो आज घर से भूखे पेट ही काम पर निकली थी. कल शाम बंगलों से मिले बचे-खुचे भोजन को उसने सुबह बच्चों की थाली में डाल दिया था. बच्चे कुछ ज्यादा ही भूखे थे. जरा देर में थाली सफाचट हो गयी थी. लाजो के लिए दो निवाले भी न बचे. लाजो ने लोटा भर पानी हलक में उंडेला और काम पर निकल गयी. सोचा किसी बंगले की मालकिन से कुछ मांग कर पेट भर लेगी.

लाजो एक रिहायशी कॉलोनी के करीब बसी झुग्गी-बस्ती में रहती है. पास की पांच-छह कोठियों में उसने झाड़ू-पोंछे और बर्तन मांजने का काम पकड़ रखा है. पांच बरस पहले जब उसका पति ज्यादा शराब पीने के कारण मरा था तब उसका सोनू पेट में ही था. उसके ऊपर दो बिटियां थीं. तीन बच्चों का पेट पालना इस मंहगाई में अकेली लाजो के लिए कितना मुश्किल था, यह सिर्फ वो ही जानती है. किराए की झुग्गी है. बच्चों को पास के प्राइमरी स्कूल में डाल रखा है. घर के किराए, बच्चों के कपड़े, फीस, किताबों में उसकी सारी कमाई छूमंतर हो जाती है. महीने बीत जाते हैं बच्चों को दूध-दही का स्वाद चखे. घर में खाना कभी-कभी ही बनता है. सच पूछो तो बंगलों से मिलने वाली जूठन पर ही उसका परिवार पल रहा है.

लाजो, पहली कोठी में काम के लिए घुसी तो मेमसाहब ने कहा, ‘लाजो, आज बर्तन नहीं है, साफ-सफाई के बाद ये लिस्ट लेकर सामने किराने की दुकान पर चली जाना. यह सारा सामान ले आना. साहब बात कर आये हैं. आज से नवरात्रे हैं. साराउपवास का सामान है. हाथ अच्छी तरह धो कर जाना.’

लाजो थैला लेकर किराने की दुकान पर पहुंची तो लिस्ट में लिखा सामान लाला ने निकाल कर उसके सामने रख दिय. प्लास्टिक की थैलियों में भरे मखाने, छुहारे, राजगिरी, सूखे मेवे, आलू और अरारोट के चिप्स, पापड़, देसी घी के डिब्बे और न जाने क्या-क्या, जिनके बारे में लाजो ने न कभी सुना था और न ही देखा था. उपवास में ऐसा भोजन? इसका मतलब आज उसको इस घर से बचा-खुचा रोटी-दाल नहीं मिलने वाला. उसका मन भारी हो गया. बच्चों के भूखे चेहरे आंखों के सामने नाचने लगे. उसके बाद के दो घरों में भी व्रत-पूजा के कारण लाजो को रोटी नहीं मिली. बस एक घर में चाय ही मिल पायी, जो उसके पेट की आग का दमन करने में असमर्थ रही. लाजों को अब ज्यादा चिन्ता इस बात की होने लगी कि अगर किसी घर से बचा हुआ खाना न मिला तो दोपहर को घर लौट कर वह बच्चों की थाली में क्या रखेगी?


उसका ध्यान धोती के छोर में बंधे पैसों की ओर गया. उसने खोल कर देखा. एक दस का नोट और पांच के तीन नोट के साथ चंद सिक्के ही थे. पूरा महीना सिर पर था, यह पैसे भी खर्च नहीं कर सकती थी. वह तेजी से चौथे बंगले की ओर चल दी. मल्होत्रा साहब की कोठी थी. ये लोग आर्यसमाजी थे. लाजो ने उनके वहां धार्मिक कर्मकांड कभी नहीं देखे थे. उनकी औरत तो व्रत-उपवास भी नहीं करती थी. उसको उम्मीद थी कि वहां तो जरूर रोटी मिल जाएगी.

तीसरी गली के बंगला नं. 5 के आगे भीड़ लगी थी. लोग कई कई गुटों में खड़े बातचीत कर रहे थे. लाजो का दिल किसी अनहोनी से धड़कने लगा. बाहर खड़ी एक महिला से पूछा तो पता चला मल्होत्रा साहब नहीं रहे. आज ग्यारह बजे उनका देहावसान हो गया. अंदर फर्श पर अर्थी पड़ी थी. घर की औरतें अर्थी को घेरे विलाप कर रही थीं. लाजो एक कोने में जाकर बैठ गयी. दो घंटे बीत गये. लोगों का तांता लगा हुआ था, अर्थी उठने का नाम ही नहीं ले रही थी. लाजो को खीज लगने लगी. उसकी आंतें भूख से कुलबुला रही थीं. उसे रह-रह कर अपने बच्चे भी याद आ रहे थे. कोठरी के दरवाजे पर मां का इंतजार करते भूखे बैठे होंगे.

दोपहर 2 बजे जाकर कहीं अर्थी उठी. मल्होत्रा मेमसाहब के दारुण क्रंदन से लाजो की आंखें भी भर आयीं. स्वयं के साथ घटित घटनाक्रम चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम गया, जब उसके पति की मृत्यु हुई थी. स्वयं का विलाप और दोनों बेटियों का हिचकियां लेकर रोना याद कर उसका गला रुंध गया.

अर्थी जा चुकी थी. घर में मरघर सा सन्नाटा पसरा था. रिश्तेदार अपने-अपने घर लौट गये थे. मेमसाहब बच्चों सहित अपने कमरे में बंद हो गयी थीं. जवानी में सुहाग उजड़ गया. छोटे-छोटे बच्चे थे. बेचारी. लाजो ने ड्राइंगरूम ठीक करना शुरू किया. सारा फर्नीचर जो अर्थी रखने के लिए इधर-उधर खिसका दिया गया था, लाजो ने अकेले खींच-खींच कर जगह पर लगाया. फिर पूरे घर में झाड़ू पोछा किया. सारा काम निपटाते-निपटाते साढ़े तीन बज गये. उसकी भूख भी खत्म हो चुकी थी, मगर बच्चों की भूख याद करके उसकी चिन्ता बढ़ती जा रही थी. काम खत्म करके वह मल्होत्रा साहब की बूढ़ी मां के पास आकर बैठ गयी. थोड़ी देर बाद बड़ी मुश्किल से बोली, ‘अम्माजी, मैं जाऊं क्या? कोई काम हो तो छह बजे तक फिर से आ जाऊंगी. बच्चे घर में अकेले मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे. भूखे होंगे.’


अम्माजी ने हामी भरी तो वह उठी. घर जाकर पहले नहाना होगा. फिर कुछ न कुछ तो पकाना ही पड़ेगा. चाहे पन्द्रह रुपये के चावल ही जाते वक्त खरीद लेगी. वह चलने को हुई तो पीछे से अम्माजी की आवाज आयी, ‘लाजो, जरा रुकना.

लाजो पलट कर उनके पास पहुंची तो बूढ़ी औरत ने धीमे स्वर में कहा, ‘लाजो, घर से मिट्टी उठी है, सूतक लगा है. आज दोपहर का भोजन तो पक चुका था. मगर खाएगा तो कोई नहीं. रसोई में पड़ा है. सारा तू ले जा.’

लाजो की आंखें एकबारगी चमक उठीं. भागते कदमों से रसोई में पहुंची. रसोई में कढ़ाई भर कर पत्तागोभी की सब्जी, दाल, पनीर का तरी वाली सब्जी, गर्म डिब्बे में रखी रोटियां, भात, पापड़, अचार और न जाने क्या-क्या रखा था. अम्माजी ने कुछ साफ पोलिथीन की थैलियां लाजो को पकड़ा दीं. लाजो ने फटाफट सारा खाना भर लिया. वह तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ी कि जल्दी-जल्दी पहुंच कर बच्चों का पेट भर दे कि अचानक उसके कदम ठिठक गये. यह खाना उस घर का था, जहां से अभी-अभी एक अर्थी उठी थी. सूतक लगे घर का खाना. क्या यह खाना वह अपने बच्चों को खिलाएगी? कोई अपशगुन तो न हो जाएगा? वह सन्न खड़ी हो गयी कि सूतक लगे घर का खाना लेकर जाए या न जाए? बंगलों से बचा-खुचा ले जाना अभी तक उसकी नियति थी. उसकी परिस्थितियां ही ऐसी थीं. ऐसे में सूतक लगे घर का खाना ले जाना भी तो परिस्थितियों के साथ समझौता ही था. पेट के आगे क्या शगुन, क्या अपशगुन?

दीवार घड़ी ने चार बजने के घंटे बजाए तो उसकी तंद्रा भंग हुई. कशमकश की दलीलों और तर्कों पर स्वयं उसकी और बच्चों की भूख हावी हो चुकी थी. हाथ में खाने का बड़ा सा पैकेट संभाले वह लंबे-लंबे डग भरते हुए घर की ओर भागी जा रही थी. आज मुद्दतों बाद उसको और उसके बच्चों को कम से कम दो वक्त भरपेट और अच्छा खाना नसीब होने वाला था. उसको याद नहीं पड़ता इससे पहले उसने रोटी, सब्जी, दाल, चावल इकट्ठे कब खाये थे?

तुम्‍हे क्‍या चाहिए........?

सत्यम और काव्य दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. दोनों इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में रहते हैं और शाम को काफी समय एक दूसरे के साथ बिताते हैं. दोस्तों जहां प्यार होता है वहां तकरार भी होना लाज़मी है. एक दिन सत्यम और काव्या के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो जाता है, दोनों कई दिनों तक एक दूसरे से बात नहीं करते झगड़े के बाद कॉलेज में अगर दोनों एक दूसरे के नजदीक से भी निकल जाए तो भी एक दूसरे से बात नहीं करते थे.

अब दोनों के बीच झगड़े को करीबन 4 दिन हो चुके थे. सत्यम का बर्थडे था और उसने अपने हॉस्टल के कमरे में कुछ दोस्तों को पार्टी के लिए बुलाया था. सत्यम पार्टी दे रहा है यह बात काव्या को पता चल गई और वह बिन बताए पार्टी में आ गई. पार्टी में काव्या को देखकर सत्यम थोड़ा हैरान हुआ लेकिन उसने काव्य से कोई बात नहीं की. काव्य की भी कुछ फ्रेंड्स पार्टी में आई थी और काव्या उनके साथ बातें करने में मशरूफ थी.
यह देखकर सत्यम को थोड़ा जलन हो रही थी क्योंकि उसकी पार्टी में काव्य आई थी और उससे बात भी नहीं कर रही थी. पार्टी शुरू हुई और सब ने बहुत एंजॉय किया. जब सब लोग हॉस्टल के कमरे से चले गए तू काव्या अकेली रह गई और सब लोगों के जाने के बाद काव्य ने हॉस्टल के कमरे को बंद कर दिया. यह देखकर सत्यम ने काव्या से पूछा तुमने हॉस्टल का दरवाजा बंद क्यों किया”.

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सत्यम (हँसते हुए): अपना मुंह बंद करो, मैं और ज्यादा एक्टिंग नहीं कर सकता. I Love You Kavya.
काव्या सत्यम के नजदीक आती है और पूछती है तुम्हें Kiss चाहिए या Hug”
सत्यम कहता हैं मुझे तुम पूरी की पूरी चाहिए
काव्या सत्यम की बाहों में गिर कर उसे कहती है तुम्हें पता है कि मैं तुमसे ज्यादा दिन नाराज नहीं रह सकती, तुमने क्यों मुझसे पहले बात नहीं की?”
सत्यम: क्योंकि गलती तुम्हारी थी….
काव्या: अच्छा चलो ठीक है अब माफ कर दो आगे से ऐसा कभी नहीं होगा.
काव्या सत्यम के लिए एक छोटा सा बर्थडे केक लाई थी और दोनों ने केक काटकर सत्यम का बर्थडे मनाया.
उसके बाद सत्यम ने काव्या को कहा अब जाओ अपने हॉस्टल में तुम्हारी कल सुबह असाइनमेंट है

काव्या: नहीं अभी मेरा दिल नहीं कर रहा है अभी मैं तुम्हारे पास कुछ देर और रहूंगी.

1 घंटे तक दोनों खूब बातें करते हैं और फिर काव्या अपने हॉस्टल में चली जाती है. सत्यम को पता था कि काव्या से अब असाइनमेंट नहीं होगी क्योंकि उसे अपनी नींद बहुत प्यारी है.
सत्यम पूरी रात जागकर काव्या की असाइनमेंट पूरी करता है.
सत्यम: मुझे पता था Baby, तुम असाइनमेंट पूरी नहीं करोगी इसीलिए मैंने तुम्हारी असाइनमेंट पूरी कर दी है, यह लो.
Kavya चुपके से सत्यम को Kiss करती हैं और गले लगा कर कहती हैं “I Love You Baby, You are the Best”                  
दोस्तों, ऐसा ही होता है सच्चा प्यार. प्यार में झगडे तो होते रहते है लेकिन जो सच्चा प्यार होता है वो लौट कर ज़रूर आता है. एक बात आप हमेशा याद रखना अगर आप किसी से सच्चा प्यार करते हो तो आप उससे कभी नफरत नहीं कर सकते, चाहे वो आपका दिल कितना ही दुखाये.

गलतफ‍हमी अपने रिश्‍ते को खराब कर देेेेती है


ये Heart Touching Kahani है अरविन्द और श्वेता की जो एक दूसरे से प्यार तो बहुत करते थे लेकिन सिर्फ एक ग़लतफहमी की वजह से सब बर्बाद हो गया. दोस्तों, ये हिंदी कहानी अंत तक ज़रूर पढ़े, हर बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड या पति पत्नी के लिए एक ज़रूरी सीख है.
अरविन्द और श्वेता में बहुत गहरा प्यार है, दोनों की शादी को 5 साल हो चुके है लेकिन उनकी ज़िन्दगी अभी भी अधूरी सी है क्यूंकि इनके को बच्चा नहीं है. फिर भी, इन्हे विश्वास है कि इस साल इन्हे बच्चा हो जाएगा. दोनों के बीच इतना प्यार है कि ये एक दूसरे के बिना बिलकुल नहीं रह सकते.
बच्चा ना होने की वजह से अरविन्द के माँ बाप श्वेता को कभी-कभी ताने मार देते है और श्वेता भी सुन लेती है क्यूंकि उसे यकीन है कि उसे बच्चा ज़रूर होगा.
यूँ ही समय बीतता चला गया और एक दिन जब अरविन्द ऑफिस से घर आ रहा था तो उसने श्वेता को बाजार में किसी दूसरे मर्द के साथ देखा. श्वेता और वो व्यक्ति बहुत खुश लग रहे थे और ऐसा लग रहा था कि वे दोनों एक दूसरे को काफी वक्त से जानते हो.

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अरविन्द घर आ गया और फिर थोड़ी देर बाद श्वेता भी आ गयी. श्वेता के आते ही अरविन्द ने उससे पुछा श्वेताकहा गयी थी?” श्वेता ने हँसते हुए कहा मैं बाज़ार गयी थी, घर का कुछ सामान लाना थाये सुन कर अरविन्द को थोड़ा गुस्सा आया लेकिन उसने श्वेता को कुछ नहीं कहा. उसके बाद अरविन्द ने श्वेता को कई बार वही आदमी के साथ अलग अलग जगहों पर देखा और एक दिन अरविन्द ने देखा कि वो आदमी श्वेता को घर तक छोड़ने आया था. श्वेता उसके साथ बहुत खुश लग रही थी, उस व्यक्ति ने को घर के बाहर छोड़ा और फिर चला गया.


अरविन्द का दिल बहुत  दुःख रहा था लेकिन श्वेता को खो देने के डर से उसने उसे कुछ नहीं बोला. एक दिन अरविन्द घर पर बैठा था कि तभी श्वेता का मोबाइल फ़ोन बजा. श्वेता बाथरूम में थी इसलिए अरविन्द ने फ़ोन उठा लिया. फ़ोन उठाते ही दूसरी तरफ से आवाज़ आई हेलो अरविन्द, मैं थोड़ी देर में घर आ रहा हूँ, कुछ ज़रूरी बात करनी है
बस इतना कह कर उस आदमी ने फ़ोन काट दिया. अब अरविन्द ये सोचने लगा कि उस आदमी को उसका नाम कैसे पता, अरविन्द के दिमाग में कई तरह के ख़याल आ रहे थे. अरविन्द को लगा कि शायद ये वो आदमी है जिसके साथ श्वेता अक्सर घूमती है.
अरविन्द को लगा कि शायद श्वेता उससे डाइवोर्स लेना चाहती है और इस सिलसिले में बात करने वो व्यक्ति घर आ रहा है, अरविन्द बहुत उदास हो गया. वो अपनी शादी को टूटने नहीं देना चाहता था लेकिन चूँकि श्वेता ने धोखा दिया, उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. अरविन्द जैसे अपनी पत्नी को खोने के डर से घबरा गया था और वही ज़मीन पर गिर गया.
इतने में श्वेता भी बाहर आ गयी और उसने अरविन्द को उठाया और पुछा क्या हुआ तुम्हे, तुम ठीक तो हो?” अरविन्द ने गुस्से में श्वेता को धक्का दिया और वो गिर गयी और उसका सिर पास रखे टेबल पर लगा. श्वेता कोई हरकत नहीं कर रही थी. कांपते हुए हाथो से अरविन्द ने श्वेता को अपनी बांहो में उठाया और देखा कि उसके सर पर बहुत गहरी चोट लगी है जिसकी वजह से श्वेता बेहोश हो गयी है. तभी अरविन्द की नज़र श्वेता के हाथो में पकडे हुए एक एनवेलप पर गयी. उसने एनवेलप खोला तो उसमे लिखा था
“Dear Arvind, मैं तुम्हे कई दिनों से बताना चाहती थी लेकिन सोचा कि तुम्हे सरप्राइज दू. मैं पिछले कुछ दिनों से अपने इलाज के लिए एक डॉक्टर के पास गयी थी और वो डॉक्टर मेरा वही cousin था जो बचपन में फॉरेन चला गया था. उसने मेरा ट्रीटमेंट शुरू किया था और अब मैं 2 महीने प्रेग्नेंट हूँ. आज मैंने अपने उस cousin को खाने पर बुलाया है, तुम उससे मिल कर बहुत खुश होंगे.
तभी दरवाज़े की घंटी बजती है और अरविन्द दौड़ कर दरवाज़ा खोलता है. दरवाज़े पर श्वेता का वही cousin खड़ा था और वो कहता है अरविन्दमैं नीरज हूँ, श्वेता का भाई, कैसे हो तुम?”
तभी नीरज की नज़र श्वेता पर पड़ती है जो खून से सनी हुई ज़मीन पर पड़ी थी. नीरज फ़ौरन श्वेता को हॉस्पिटल ले जाता है और वहां श्वेता कोमा में चली जाती है. श्वेता अपने बच्चे को भी खो देती है. अरविन्द अपना सिर पकडे श्वेता के पैरो पर बैठा उससे माफ़ी माँगना चाहता था लेकिन श्वेता अभी भी कोमा में ही थी. एक छोटी सी गलत फेहमी ने श्वेता और अरविन्द के रिश्ते में भूचाल ला दिया.
दोस्तों, ये कहानी हमें बहुत बड़ी सीख देती है. गहरे रिश्ते में किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले अपने पार्टनर से बात ज़रूर करनी चाहिए. खामियां हम सबमे होती है लेकिन अपने पार्टनर पर इल्जाम लगाने से पहले अच्छे से जांच ले और सबसे ज़रूरी उससे खुल कर बात करे. आप जो देखते है या सुनते है वो ज़रूरी नहीं कि सच हो. दोस्तों, अगर ये हिंदी स्टोरी आपके दिल को touch की हो तो हमें कमेंट में अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दे, हमें ख़ुशी होगी आपके विचार सुनकर और आपसे अपने कुछ विचार शेयर करके।

पढ़िए चलती बस में निकाह... आप भी कहेंगे वाह भई सुभानल्लाह


गोंडा से दिल्ली बस जा रही थी जब बस स्टेशन से चल पड़ी तो फ्रंट सीट पर बैठे एक बुज़ुर्ग जो बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए था 

खड़े हो गए और बाकी मुसाफिरों से मुखातिब होकर कहा ...

मेरे भाइयों और बहनों मैं कोई भिखारी नहीं हूँ अल्लाह ने मुझे अपनी नेअमतों से नवाजा है मगर मेरी बीवी एक मर्ज से अल्लाह को प्यारी हो गई कुछ दिन गुज़रे और मेरी फैक्ट्री में आग लग गई मैं इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का कारोबार करता हूँ...

मेरा सभी माल जलकर खाक़ हो गया फिर कुछ मुद्दत गुज़री कि मुझे दिल का दौरा पड़ा रिश्तेदारों ने जब ये महसूस किया कि इसके बुरे दिन आने लगे उन्होंने हमसे राब्ता बन्द कर दिया डॉक्टरों ने मेरे बचने की जमानत कम ही दी है मेरी ये जवान बेटी है इसका कोई वारिस नहीं रहेगा कोई इसके दामन अस्मत को तार-तार ना करे यही ग़म ज़्यादा खाए जा रहा है और उस शख्स की हिचकी बन्ध गई उसकी बेटी जो पास में बैठी थी उठी और बाप को सहारा देकर सीट पर बैठा दिया ...

बस की पिछली सीट से एक आदमी खड़ा हुआ और कहने लगा मेरे दो बेटे हैं एक डॉक्टर है उसका निकाह हो चुका है और दूसरा ये जो उस शख़्स के आगे बैठा हुआ है इंजिनियर है इसके लिये दुल्हन की तलाश है मैं उस बुज़ुर्ग से दरख़्वास्त करता हूँ कि ये अपनी बेटी का निकाह मेरे इस बेटे से कर दें मैं वादा करता हूँ कि बच्ची को कभी बाप की कमी महसूस नहीं होने दूंगा ....
लड़का खड़ा हो गया और कहा मुझे रिश्ता कबूल है....
बस में मौजूद एक मौलवी साहब खड़े होकर कहने लगे ये सफर बहुत मुबारक सफर है निकाह जैसा मुक़द्दस अमल हो जाए वह भी सफर में इससे अच्छी बात क्या होगी...?

अगर लोगों को ऐतराज़ न हो तो मैं निकाह पढ़ा दूँ.....


सब कहने लगे माशा अल्लाह , सुब्हान अल्लाह , अल्हम्दुलिल्लाह वगैरह, वगैरह

और मौलवी साहब ने निकाह पढ़ा दिया ....

एक और साहब खड़े होकर कहने लगे मकीन छुट्टी पर जा रहा था अपने घर वालों के लिये लड्डू लेकर मगर इस मुबारक अमल को देखकर समझता हूँ कि लड्डू इधर ही तक़सीम कर दें उसने दुल्हन के बाप से मुख़ातिब होते हुए कहा...

दुल्हन के बाप ने ड्राइवर से कहा ...ड्राइवर मियाँ 5 मिनट किसी जगह बस रोक देना ताकि सब मिलकर मुंह मीठा कर लें ड्राइवर ने कहा ठीक है बाबा जी ....
मग़रिब की नमाज़ बाद जब अन्धेरा होने लगा तो लड़की के बाप ने ड्राइवर से बस रोकने को कहा ...
और सब मुसाफिर मिलकर लड्डू खाने लगे , लड्डू खाते ही सब मुसाफिर सो गए ड्राइवर और कंडक्टर जब नींद से जागे तो अगली सुबह के 8 बजे थे मगर दुल्हन और दूल्हा और उनके दो बाप मौलवी साहब और लड्डू बांटने वाला बस से ग़ायब थे इतना ही नहीं बल्कि किसी मुसाफिर के पास ना घड़ी ना चैन ना पैसे बल्कि कुछ भी नहीं था उनको ये 6 मेम्बर का ग्रुप पूरी बस को मुकम्मल तौर पर लूट चुका था..... 😂😂😂😂
तो बोलो ...अरे बोलो माशाल्लाह 😄 😄

नोट : इस चोर लुटेरी गैंग से सावधान रहें सुरक्षित रहें !


सुहागरात (दूसरा भाग)

दोस्तों हिंदी कहानी सुहागरात का दूसरा भाग है अगर आपने अभी तक पहला भाग नही पढ़ा है तो आप यहाँ क्लिक >> सुहागरात (पहला भाग) करके पहला भाग पढ़ सकते है आगे की कहानी जारी :


..उधर निशा का चिडचिडापन बढ़ता जा रहा था। बेमन से वह घर के कामों में सास का हाथ बटाती... सबके साथ उदासीन सा व्यवहार करती। उसके अंदर की सुघड गृहिणी और बेहतरीन कुक मानो खो से गए थे। बस किसी तरह दिन काट रही थी। सास उसे कई बार कह चुकी थी कि राजीव को मुगलई दाल मखनी और मिस्सी रोटी बहुत पसंद है ...उसके लिए बना दे ..मगर वह टाल देती।
6 महीने बीत गए । राजीव अपने वादे पर खरा उतरा था..। उसने भूलकर भी कभी निशा के करीब आने की कोशिश नहीं की और ना ही कभी निशा को जताया कि उसे कोई शिकायत है। इसके विपरीत वह हमेशा निशा को खुश रखने की कोशिश करता । एक समर्पित पति की तरह अक्सर ही निशा को कभी मूवी.. कभी रेस्तरां ..तो कभी मंदिर ले जाता । उस की छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखता।
इन्ही दिनो उषा ने एक बेटे को जन्म दिया । उषा की सास की तबीयत इन दिनी कुछ ठीक नहीं थी । जच्चा.. बच्चा के साथ साथ घर की समुचित देखरेख करने का सवाल के सामने खड़ा हो गया। इस स्थिति का जैसे ही निशा को पता चला उसने 10-15 दिन उषा के घर रहकर उसकी गृहस्थी में हाथ बताने का प्रस्ताव रखा । राजीव और उसकी मम्मी ने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी।
निशा...उषा के घर चली गई ।
उन्ही दिनो रामनिवास का अपने भाइयों के साथ चल रहा बटवारे का मुकदमा जिरह की स्टेज पर आ गया।यदि रामनिवास मुकदमा जीत जाते तो लगभग 15 करोड़ की संपत्ति उनके हिस्से में आ जाती।
दोनों बाप बेटे रोज कचहरी जाते...घंटो वकीलो संग माथा मारते ।आखिरकार जिरह पूरी हुई ... 3 दिन बाद फैसला सुनाने की तिथि निश्चित की गई।
जिस दिन जिरह पूरी हुई उसी रात राजीव के मामा को....जो मेरठ मे रहते थे... अचानक दिल का दौरा पडा और वो चल बसे। रामनिवास और उनकी पत्नी को मेरठ जाना पड गया.. जहां एक हफ्ता लग जाना मामूली बात थी।
निशा अपनी बहन के घर ..और..माता पिता मेरठ..।राजीव घर मे अकेला रह गया।
उधर निशा ने उषा की गृहस्थी बखूबी संभाल ली। उसने बड़ी लगन से उषा और उसकी सास की समुचित देखभाल की ..घर का ध्यान रखा.. ।। यहां रहने के दौरान अजय के शानदार व्यक्तित्व का जादू और इनकी शानो-शौकत उषा के सर चढ़कर बोलने लगी थी। वह अक्सर अपनी ससुराल और उषा के ससुराल की तुलना किया करती ..राजीव और अजय की तुलना किया करती और मन ही मन अपनी किस्मत पर कुढती रहती । घर के कामों के अलावा जब भी समय मिलता वह और अजय खूब हंसी मजाक किया करते.. ताश खेला करते..टीवी देखते..।।
उसे यहां आये पांचवा दिन था।निशा ने सब को खाना खिलाया.. उषा और उसकी सास को अलग अलग आहार बना कर दिया.. दवाइयां दी.. सारा काम निपटाकर अपने कमरे में ..जो कि उषा के बेडरूम के बगल में था.. सोने चली गई।
पलंग पर लेटते ही उसे नींद आ गई। थोड़ी देर बाद अचानक उसे अपने बदन पर किसी के स्पर्श का एहसास हुआ तो उसकी नींद खुल गयी। कमरे में जलते हुए नाइट बल्ब मद्धिम रोशनी में उसने देखा कि अजय उसके बगल में बैठा है और उसके हाथ में उसके जिस्म पर नैतिकता की सीमा लांघकर फिर रहे है।
वह बुरी तरह चौंककर उठ बैठी।उसकी जुबान को ताला सा लग गया ..कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या बोले..!!
उसकी चुप्पी का अजय ने कुछ और ही मतलब समझा.. उसका हौसला और बढ़ गया।उसने निशा के चेहरे को बाहों के घेरे में लेकर उसके होठों को चूमने की कोशिश की ...और कान मे फुसफुसाया.." आई लव यू निशा..आओ इस रात को हसीन बना दें..।।"
अजय के कुत्सित इरादों को भांपते ही निशा जैसे सकते की हालत से बाहर निकली..।। वह तडपकर उससे परे होती हुई ...अजय चेहरे पर एक जोर का तमाचा लगाया.. और नफरत भरे स्वर में बोली.." चुपचाप निकल जाओ यहां से..। अगर मुझे उषा का ख्याल ना होता तो सारे घर के सामने आपको नंगा कर देती..गेट आऊट..!!"
जिल्लत और शर्म से भरकर अजय चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया ।।
उसके बाहर जाते ही निशा बिलख बड़ी। आज मानो वह एक छद्म दुनिया से बाहर निकली थी। अजय की जिस छवि के सम्मोहनने उसकी सोच को जकड़ रखा था वह आज तार तार हो गई ।रोते-रोते उसके जेहन पर राजीव का निष्पाप चेहरा उभरा... जो अजय जितना सुंदर भले ही ना हो ..मगर जिससे सच्चाई का नूर टपकता था।
उसके जेहन पर राजीव से जुड़ी यादे उभरने लगी। कैसे उसने बेक़सूर होते हुए भी बिना शिकायत निशा की ज्यादती सही थी.. कैसे वह हर वक्त उसकी खुशियों की परवाह किया करता था ..।।उसे याद आया कि पिछले दिनों एक शादी समारोह में अजय जहां गर्भवती उषा को अकेला छोड़कर.. लड़कियों के साथ चुहलबाजी.. फ्लर्ट और मस्ती में डूबा था वही ..राजीव सारे समारोह में उसके साथ साथ रहा था ।। राजीव के लिए तो मानो निशा के आगे दुनिया खत्म थी ।।
बड़ी मुश्किल से सदियों की तरह लंबी वो रात गुजरी..।। सुबह होते ही निशा ने अपना सामान पैक किया और उषा की सास के कमरे में जाकर कहा.." आंटी जी मेरा मन जरा ठीक नहीं है.. मैं घर जा रही हूं.. आप उषा को बता देना ..ll" और उनका जवाब सुनने से पहले ही वह बैग उठाकर घर के बाहर निकल गई और टैक्सी पकड़कर सीधी अपने घर पहुंची।
सुबह के 8:00 बजे थे। राजीव घर पर अकेला बैठा ड्राइंग रूम में tv देख रहा था । निशा को देखकर वह हैरान रह गया ।
"अरे ..तुम तो 8-10 दिन बाद आने वाली थी..!!"
" मेरा मन नहीं लगा वहां .. इसलिए लौट आई।।..आपने नाश्ता कर लिया..?" वह अपनेपन भरे स्वर में बोली।
" नहीं अभी तो बस उठा हूं.. आज हमारे बंटवारे के मुकदमे का फैसला आना है। 9:00 बजे कचहरी जाना है.. वहीं से दुकान पर चला जाऊंगा ।शायद आज लंच के लिए घर ना आ सकूं.. बाहर ही कुछ खा लूंगा।"
" आप तैयार हो जाइए.. मैं नाश्ता बना देती हूं..।"
राजीव ने सहमति मे सिर हिलाया..टीवी ऑफ किया.. और बाथरूम में घुस गया।
ड्राइंग रूम में अकेली खडी निशा ने सारे घर पर निगाह दौड़ाई ..।।आज घर का जर्रा जर्रा उसे अपना स्वागत करता महसूस हो रहा था । उसने एक ठंडी सांस ली.. और किचन में घुस गई थी ।
राजीव के नहा धोकर तेयार होने तक निशा ने सैंडविच और चाय बना ली और उसे सर्व कर दिया। जब तक वह नाश्ता करके उठता निशा ने फटाफट गोभी के दो पराठे और आम का मीठा अचार एक टिफिन में पैक कर दिया..। राजीव अपना बैग लेकर घर से निकलने को हुआ तो वह फटाफट टिफिन लेकर आई और उसे थमा दिया..और अधिकारपूर्ण भाव से बोली..." बाहर का खाने की कोई जरूरत नहीं..यह गोभी के पराठे पैक कर दिये है लंच में खा लेना।"
निशा के बदले बदले अंदाज राजीव को भी महसूस हो रहे थे। .."जरूर ये उसका वहम है" ..उसके मन ही मन सोचा ..फिर भी मन में एक अजीब से हर्ष का अनुभव करता उसने टिफिन बैग में रखा और विदा हो गया।
पीछे घर में निशा अकेली रह गई। उसने चारों ओर निगाहे दौड़ाई ।गृहिणी की उपस्थिति के अभाव में घर अपेक्षानुरूप बिखरा पड़ा था। उसमें साडी का पल्लू कमर में खोंसा और मनोयोग से घर को व्यवस्थित करने में जुट गई। शाम तक वह लगी रही.. इस दौरान उसने अपना सारा हुनर इस्तेमाल कर लिया ..और शाम होते होते जो घर सुबह कबूतरखाना हो रहा था... वह एक सुव्यवस्थित आशियाना बन गया।
शाम के 5:00 बज गए । वह थक गई थी.. मगर अभी उसे कुछ और करना था ।।उसने आधे घंटे आराम करके अपनी थकान मिटाई ...फिर उठी और नहा धोकर फ्रेश हुई।।उसने घड़ी पर निगाह दौडाई। 7:00 बजने को थे...।। 8:00 बजे राजीव का आना अपेक्षित था। कुछ याद करके उसके चेहरे पर एक मीठी मुस्कान तैर गई। फिर वह किचन में घुस गई और बेहद मनोयोग से मुगलई दाल मखनी व धनिये की चटनी बनाई और मिस्सी रोटी का आटा तैयार करके रख दिया।
अपेक्षानुरूप सवाआठ बजे राजीव घर लौटा ।उसका चेहरा खुशी से दमक रहा था। घर में घुसते ही उसने बैग सोफे पर फेंका और हर्षित स्वर में बोला..." निशा.. हम केस जीत गए..!! अब हमें अपना हक मिल जाएगा। हम जीत गए ..निशा.. हम जीत गए..!!" ...कहते कहते उसने घर पर चारों ओर नजर दौडाई..।। घर का कायापलट हो चुका था।उसने हैरानी से निशा की ओर देखा। निशा ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया और मन ही मन बोली.."हां राजीव ...आप जीत गए ..!!अब आपको आपका हक जरुर मिलेगा!!"
"आप हाथ मुंह धो लीजिए मैं खाना लगाती हूं।" ..वह प्रत्यक्षतः बोली.. ।। " आज इतनी बडी खुशी का दिन है..हम साथ खाना खायेगे..।"
राजीव को कानों पर विश्वास नहीं हुआ।
"हां हां क्यो नही...!! वह प्रसन्नता से बोला।"क्या बनाया है आज..?"उसने पूछा।
" दाल मखनी और मिस्सी रोटी..।" निशा मीठी मुस्कराहट के साथ बोली।
"खास मेरी पसंद का खाना..!!" राजीव हैरान होता हुआ मंत्रमुग्ध सा वाशबेसिन की ओर मुड़ गया। वो समझ नही पा रहा था कि इतने बजे केस मे मिली जीत की खुशी मनाये या निशा के बदले व्यवहार की..!!"
थोड़ी देर बाद..।। दोनों ड्राइंग रूम के फर्श पर ही बैठ कर एक ही थाली में डिनर कर रहे थे।। खाना इतना जायकेदार बना था कि राजीव उंगलियां चाटता रह गया था। आज खाने के जायके मे एक मंजे हुए कुक के हुनर के साथ-साथ अपनी प्रियतमा के मनुहार का तड़का भी साथ था ।।राजीव की आत्मा तक तृप्त हो गई ।

खाने के बाद निशा ने बरतन वगैरह हटाए.. और फिर राजीव से बडे मनुहार भरे स्वर में बोली..." मेरा आइसक्रीम खाने का बड़ा दिल कर रहा है..? आप क्वालिटी बूथ से कसाटा का पैक मेरे लिए ला दोगे.. प्लीज..!!"
"अरे इतनी सी बात ..!!"..राजीव प्रसन्नता से बोला। उसके लिए यही बहुत था कि निशा ने उसे किसी काम के लिए बोला था। "देखो.. इस समय तो आइसक्रीम जनकपुरी मोड पर ही मिलेगी ...आने जाने में कोई आधा घंटा लग जाएगा.. तब तक तुम tv देखो मै आईसक्रीम लेकर आता हूं।" कहकर राजीन ने कार की चाबी उठाई और फ्लैट से बाहर निकल गया ।
यही तो निशा चाहती थी ।उसके जाते ही निशा अपने कमरे में गई ...अलमारी खोली.. और अपनी शादी का जोड़ा निकाल लिया।आज उसे फिर से दुल्हन बनना था..।।वह खुद का श्रृंगार करने में लग गई ..।।आधे घंटे बाद ...!! दुल्हन के जोड़े में सजी उसने अपना रूप आईने में देखा तो अपने हुस्न के जलाल को देखकर खुद ही शर्मा गई।फिर वह उसी पोज में बेड पर बैठ गई जैसे अपनी सुहागरात के समय बैठी थी.. और विरहणी की तरह अपने पति की प्रतीक्षा करने लगी। उसका रोम रोम आज राजीव के प्रति समर्पण के भाव में सुलग लग रहा था ।।
तभी उसे बाहर से राजीव की आवाज सुनाई दी..." निशा.. निशा..!! अरे भई कहां हो ..?"
आवाज लगाता हुआ वह बेडरुम में आया । वहां का नजारा देखते ही थमक कर खड़ा हो गया।

उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसे लगा कि वह कोई सपना देख रहा है। दुल्हन की तरह सजा कमरा.. और दुल्हन के जोड़े में सजी निशा..।।। सारा मंजर अपनी कहानी खुद कर रहा था।। पलंग पर बैठी निशा का रूप अपसराओ को मात कर रहा था।
निशा धीरे से उठी और उसके पास चल कर आई। उसने अजय के हाथों से आइसक्रीम का पैकेट लेकर टेबल पर रख दिया और नज़रें नीची किए हुए बोली.." मेरे गुनाह की जो सजा आप दोगे मुझे मंजूर है ..मगर अपने दिल से मुझे कभी मत निकालना..!!" कहते हुए उसकी कमल जैसी आंखों से दो मोती निकलकर उसके गालों पर लुढक आये।
राजीव कंपित स्वर में बोला.." निशा ..मै कही सपना तो नहीं देख रहा ..!!तुमने मुझे स्वीकार कर लिया.?
निशा ने अपनी गोरी बाहे राजीव के गर्दन के गिर्द लपेट दी और भावविह्वल स्वर मे बोली.."मुझ जैसी बददिमाग लडकी को आपने स्वीकार किया ...कभी नफरत की नजर से देखा तक नही...ये तो मेरा सौभाग्य है..राजीव..!! मै आप जैसे देवता पुरूष के काबिल कहां हूं..!!"
राजीव ने आतुर भाव से उसे बांहो मे भर लिया। निशा लता की तरह उससे लिपट गई।वक्त जैसे थम गया।
कितनी ही देर दोनो यूं ही आलिंगनबद्ध खडे रहे।फिर निशा ने राजीव के कानो मे प्यारभरे स्वपनिल स्वर के साथ कहा.." उषा को बेटा हो गया..अब हम भी मम्मी पापा बनेगे..!!"
राजीव भावविभोर स्वर मे बोला.."हां...मगर मुझे बेटी चाहिये..।। तुम्हारे जैसी..!!"
"नही...!! आप जैसी..।। मेरे जैसी हुई तो नकचढी बनेगी..।।" वो हंसते हुए बोली।
राजीव भी हंस पडा।
दोनो ने पलंग की ओर नजर उठाई। निशा ने शर्माकर सिर झुका लिया।राजीव ने उसे अपनी बलिष्ठ बांहो मे उठाया और पलंग की ओर बढ चला।
सडक पार कहीं दूर लाउडस्पीकर पर गाना बज रहा था.."दो सितारो का जमीं पर है मिलन आज की रात..।।"
आईसक्रीम उपेक्षित सी पडी ...पिघलती रही।
आज उनकी सुहागरात थी।

सुहागरात

उषा और निशा ... ll दिल्ली के विकासपुरी के मशहूर कारोबारी सुभाष तायल की लाडली बेटियां..ll उषा.. निशा से 2 वर्ष बड़ी थी। उषा का रंगरूप जहां ठीक-ठाक था वहीं निशा बेहद खूबसूरत थी। जहां भी जाती उसकी सुंदरता का सिक्का जम जाता । सभी उसे दुलारते पुचकारते..ll

दोनों का बचपन संपन्न परिवार की छत्रछाया में सुख पूर्वक बीत रहा था। दोनों एक साथ लुका छुपी खेलती.. तो कभी गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाती..ll उषा.. निशा को अक्सर चिढाया करती कि..." जैसा तेरा गुड्डा काला कलूटा है ना.. वैसा ही तेरा दूल्हा होगा..ll".. निशा भी तमक कर जवाब देती ..." अरे तू देख लियो..मेरे लिए तो कोई राजकुमार आएगा ..ll"

वक्त बीतता रहा..ll दोनों ने यौवन की दहलीज पर कदम रखा। निशा हर मामले में उषा से बढ़कर थी.. उसके रंग रूप की चर्चा तो पूरे समाज में होती ही थी.. मगर रंग रुप के साथ साथ पढ़ाई.. पाककला ...गृहकार्य में भी वह दक्ष थी l इसी वजह से उसमे बचपन से ही एक सुपिरीयोरिटी काम्प्लेक्स का भाव था। उसके व्यक्तित्व में एक छिपा सा अहंकार था । वह बचपन से ही परिवार वालों.. . रिश्तेदारों.. पड़ोसियों के मुंह से अपनी तारीफ सुनते-सुनते बड़ी हुई थी ll
उषा भी सुंदर है....मगर निशा का तो जवाब नहीं...
खाना तो उषा भी अच्छा बनाती है मगर निशा जैसा नहीं

बना सकती ...
निशा को देखो फिर क्लास में अव्वल आई है और..उषा फिर से सिर्फ पास हुई है...

और उषा ही क्यों आस पड़ोस और क्लास की लड़कियों से भी जब भी उसकी तुलना की जाती है वह हमेशा 21 घोषित की जाती थी। इन्ही तारीफो के सदके उसके अवचेतन में खुद के नंबर वन होने की भाव भर दिया था ।। उसे सदा यही लगता था कि कोई भी दूसरी लड़की उसके मुकाबले कुछ नहीं है।

सुभाष तायल की समाज में काफी प्रतिष्ठा थी।। इधर बेटियां बड़ी हुई.. उधर उनके लिए रिश्ते आने लगे ..और एक शुभ संयोग में उषा का रिश्ता लक्ष्मी नगर निवासी अजय हो गया l
अजय एक अमीर और प्रतिष्ठित खानदान से ताल्लुक रखता था ...अपने पिता का एकलौता बेटा था और बहुत हैंडसम था ll निशा ने जब अजय को देखा तो मानो सम्मोहित हो गई ll 6 फुट से निकलता कद.. गठीला बदन... गेहुआ रंग ..तीखे नैन नक्श और बेहद सलीकेदार..ll साथ ही साथ बेहद अमीर ll..सचमुच वह किसी भी नव यौवना के सपनों का राजकुमार हो सकता था ।।
उषा और अजय की शादी खूब धूमधाम से हो गई। सुभाष तायल ने पैसा खर्च करने में कोई कमी नहीं रखी। विवाह उत्सव के दौरान निशा सज संवर कर विभिन्न आयोजनों में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही थी.. हर जगह आगे-आगे थी। उसके रंग रूप का जलवा कुछ ऐसा चढा था कि वर पक्ष के लड़कों के दिल पर मानो बिजलियाँ पड़ी थी... तो लड़कियां इर्ष्या से सुलग उठी थी। पूरे विवाहोत्सव में निशा के रंग रूप और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व की चर्चा थी। खैर विवाह संपन्न हुआ और उषा अपने पिया के घर चली गई। सपनों के एक सुंदर संसार से निकली तो कहीं अधिक सुंदर और सजीले संसार में चली गई । अजय हर लिहाज से एक अच्छा जीवन साथी साबित हुआ था.. और दोनों की गृहस्थी सुखपूर्वक चलने लगी lll
कुछ अर्से बाद निशा के लिए भी रिश्ते आने लगे। मगर सुपीरियरोरिटी काम्पलेक्स के भ॔वर में फसी निशा को कोई भी रिश्ता पसंद नहीं आता था । वह हर लड़के की तुलना मन ही मन अजय से करती थी.. कोई लड़का लुक में अजय से कमतर होता तो कोई पैसे में...ll किसी का परिवार बड़ा होता तो किसी की गाड़ी और कोठी छोटी होती ll निशा एक तरह से मृगतृष्णा में जी रही थी।। उसके अवचेतन को यह कबूल नहीं था कि उसका घर वर किसी भी लिहाज से उषा से कमतर हो..ll अपनी इसी महत्वाकांक्षा में उसने कई अच्छे रिश्ते ठुकरा दिये। उसके पापा मम्मी उसे बहुत समझाते थे कि छोटी मोटी किसी बात के लिए इतने अच्छे रिश्ते ठुकराना ठीक नहीं.. मगर निशा के दिमाग में तो नंबर वन होने का मुगालता चढा था ।।
इसी उहापोह मे 2 वर्ष बीत गए ..ll रिश्ते आने भी कम हो गए । निशा ने एम ए प्रथम वर्ष में दाखिला ले लिया।
कहते हैं वक़्त कभी एक सा नहीं रहता। सुभाष तायल के सुखी संपन्न जीवन को भी आखिरकार वक्त की नजर लगी ..ll एक दिन उनकी दुकान और गोदाम पर इनकम टैक्स की रेड हुई और उनके एकाउंट्स में कई अनियमितताएं पाई गई। इनकम टैक्स द्वारा उनके गोदाम को सील कर दिया गया ...और उनपर दो करोड़ का भारी भरकम जुर्माना ठोक दिया गया।। लाखों का माल जब्त कर लिया गया ...साथ ही साथ आवश्यक वस्तु अधिनियम के मुकदमा भी ठोक दिया गया.. जिसमें यदि वह दोषी साबित हो जाते तो उनको जेल भी हो सकती थी ।।

संकट की इस भीषण घडी में उनके पुराने मित्र रामनिवास गोयल ने उनका साथ दिया। रामनिवास गोयल स्थानीय पॉलिटिक्स में थोड़ी बहुत पंहुच रखते थे । उन्होंने एप्रोच लगाकर मामला खत्म करवाया..।। ढाई करोड़ की बजाए सिर्फ 25 लाख जुर्माना ही भरना पड़ा.. गोदाम भी खुल गए..जब्त माल भी छूट गया.. और साथ ही साथ की केस खत्म करवा दिया। एक तरह से सुभाष तायल बड़े सस्ते छूटे थे और यह सब सिर्फ और सिर्फ रामनिवास की मदद से संभव हो पाया था। ऐसे बुरे वक्त में उनके सगे जीजा ...जो कि भूतपूर्व सांसद थे और कुछ अन्य करीबी लोग जिनकी पहुंच ऊपर तक थी.. सभी ने मुंह मोड़ लिया था। तब रामनिवास ने उनके हद से ज्यादा मदद की थी ..रात दिन भाग दौड़ की थी ...और कईयो का एहसान अपने सिर पर लिया था। सुभाष तायल दिल से रामनिवास के बडे शुक्रगुजार थे। उनकी कृतज्ञता का ये आलम था कि यदि रामनिवास उनकी जान भी मांगते तो वह ना नहीं कर पाते।

तीन चार महीनों बाद जब सारा मामला फारिग हुआ.... परिवार में सुकून के दिन लौटे ...तो एक दोस्ताना मुलाकात के दौरान रामनिवास ने सुभाष तायल से अपने बेटे के लिए निशा का हाथ मांग लिया।

रामनिवास और सुभाष के आर्थिक और समाजिक रुतबे में बड़ा अंतर था ।यूं तो रामनिवास भी पुराने खानदानी रईस थे.. मगर उनका अपने दो बड़े भाइयों से पुश्तैनी जायदाद के लिए बंटवारे का विवाद चल रहा था.. और मामला कोर्ट में था। उन दिनों वह दाल मिल रोड पर अपनी तीन कमरों के एक ठीक-ठाक से फ्लैट में अपनी पत्नी और इकलौते बेटे राजीव के साथ रहते थे। आय का साधन हस्ताल रोड पर एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान थी जो अच्छी चलती थी। दोनों बाप बेटे उसी दुकान पर बैठते थे ।।

राजीव ...एक मध्यमवर्गीय सोच रखने वाले लाखो लडको की तरह ही एक लड़का था ..जिसकी दुनिया दुकान...घर..और कचहरी तक सीमित थी।

देखा जाए तो ना तो समाजिक लिहाज से दोनों परिवारों में रिश्ता होने लायक मेल था...और ना ही निशा के सामने राजीव कही ठहरता था । मगर फिर भी एहसान के बोझ तले सुभाष...इनकार ना कर सके। पिछले दिनों के संकट के दिनों की गहमागहमी और इस संकट से निकालने में रामनिवास का योगदान निशा से छुपा नहीं था..।। उन दिनो वैसे भी उसके लिए रिश्ते आने कम हो गए थे। राजीव उसे जरा भी पसंद नहीं था मगर फिर भी उसने बेमन से हां कर दी ।।

दो महीने बाद एक सुरुचिपूर्ण समारोह में राजीव और निशा का विवाह हो गया। इस बार चूंकि लड़के वाले अपेक्षाकृत कम हैसियत वाले थे इसलिए विवाह का आयोजन उतना भव्य और धूमधाम वाला नहीं था जितना उषा के विवाह में था। दुल्हन के श्रृंगार में निशा पर कुछ ऐसा रूप चढ़ा था कि चारों तरफ वाह वाह हो गई थी।
राजीव अपनी किस्मत पर फूला नहीं समाता था ।उसने सपने में भी नहीं सोचा था किस्मत उसके लिए इतनी खुशियां लेकर अयेगी कि उसे अपना दामन छोटा लगने लगेगा ।

एक तो एक तो होने वाले ससुराल की साधारण हैसियत.. दूसरे जीवनसाथी के रुप में राजीव का साधारण व्यक्तित्व ..और ऊपर से विवाह समारोह भी साधारण...ll निशा के दिल में कोई उत्साह ..उमंग नहीं था। सारी जिंदगी हमेशा सबसे अव्वल रहने वाली निशा अपने जीवन के इतने अहम मोड पर पिछड़ गई थी..।। उनके बचपन मे उषा द्वारा भोलेपन मे कही गई बात.." तेरा दूल्हा तो काला कलूटा होगा.." मानो आज शाप बनकर सच हो रहा था । यह टीस ..यह कसक.. उसे चैन नहीं लेने देती थी । पूरे विवाह समारोह के दौरान वह खिंची खिंची रही । हर रीति रिवाज को बेमन से निभाती रही। वरमाला हो.. फेरे हो.. श्लोक सुनाई हो.. या विदाई..।। यंत्रवत सी हर रस्म निभाती रही ।विदाई से पहले वर वधू के जुआ खेलने के दौरान जब राजीव ने पानी में मुंदडी ढूंढने के दौरान उसका हाथ शरारत से पकड़ लिया था तो उसने बड़ी बेरुखी से उसका हाथ झटक दिया ।

राजीव को भी थोड़ा-थोड़ा एहसास हो रहा था कि निशा कुछ असहज है ..मगर उसने इसे एक बेटी द्वारा पिता का घर छोड़ने की वेदना ही समझा। उसने मन ही मन प्रण कर लिया कि वह निशा को इतना प्यार देगा कि वह अपना मायका भूल जाएगी ।। उसे कभी किसी बात के लिए शिकायत का मौका नहीं देगा। बार-बार वह निशा की ओर मोहब्बत भरी नजरों से निहारता और उसकी उल्फत की परवाज उरूज पर होती जाती ।

मगर...!! सुहाने सपने अक्सर बीच में ही टूट जाते हैं...!! राजीव को क्या मालूम था कि जिस मूरत को उसने मन मंदिर में इतने प्यार से बिठाया था ..उसकी पूजा करने लगा था.. उस मूरत में प्नाण नहीं थे ..जज्बात नहीं थे ..प्यार मोहब्बत का कोई वजूद नहीं था..। वह मूरत उसके लिए सिर्फ एक पत्थर का तराशा हुआ हसीन मुजस्समा था .. जिसके कदमों में अपनी उल्फत के फूल चढ़ाने के बदले उसे मिलनी थी बेरुखी.. बेदिली ..और नफरत..।।..निशा विदा होकर ससुराल आ गई।
आज उस की सुहागरात थी...।

राजीव के लिए एक एक पल सदियों के समान बीत रहा था । सारे दिन पड़ोस और रिश्तेदारी की औरते आती रही । राजीव के यार दोस्त आते रहे। सब ने चांद जैसी बहू के आने के बधाइयां दी llराजीव को मन ही मन उन सभी पर गुस्सा आ रहा था.. " ये बुड्ढिया टलती क्यों नहीं.. यह दोस्त कमीने मन ही मन तो मेरी किस्मत से जल रहे हैं..!!" उसका बस चलता तो वह अभी ही रात कर देता ।। खैर..मुंह दिखाई की रस्म और दिन में दो-तीन घंटे आराम के बाद आखिरकार मिलन की बेला भी आ ही गई ।

राजीव ने बड़े अरमानों से अपना कमरा सजवाया था। दिल में हजारों अरमान लिए उसने सुहाग कक्ष में प्रवेश किया । उम्मीद के मुताबिक फूलों से सजी सेज पर निशा यू बैठी थी कि उसके पैर सामने की ओर आधे मुडे थे और घुटनों मुखडा टिकाये.. वह चुपचाप बैठी थी।।
राजीव ने नजर भर कर अपनी दुल्हन को देखा..।। काश.. वह एक चित्रकार होता तो इस अद्वितीय सुंदरता को कैनवास पर उतार कर अमर हो जाता ..!! काश.. वह एक शायर होता तो इस बेपनाह हुस्न की शान में कितने ही सफे भर देता...!! मगर... शायद कोई भी चित्र या कलाम उसकी पत्नी अप्रतिम सौंदर्य के समक्ष फीके ही रहते ...!!!
मीठी मीठी अनुराग भरी अनुभूतियों के साथ वह पलंग पर निशा के बगल में बैठ गया । दिल में अरमानों का सागर हिलोरे मार रहा था ..आंखों में सजीले सपने तैर रहे थे... लबों पर मीठी मुस्कान खेल रही थी।
निशा ने सिर उठाया ।। राजीव के कुछ बोल पाने से पहले ही उसने कहा .."मैं कुछ कहना चाहती हूं ..।"
"हां हां बोलो"..राजीव मीठे स्वर में बोला।। उसे नहीं मालूम था कि अरमानों के सुलगते शोलों पर बेरुखी की बारिश होने वाली है..।।

" जी देखिए ..मैंने यह शादी अपनी खुशी और मर्जी से नहीं की।आप मुझे पति के रुप में जरा भी पसंद नहीं है..। आपके पापा ने हमारे परिवार पर जो अहसान किया था इस वजह से मै शादी के लिए इंकार नहीं कर सकी। पति पत्नी का रिश्ता सिर्फ शरीर का मिलन ही नहीं होता... बल्कि दिलों का मिलन होता है । और.. मेरे दिल में आपके लिए कोई स्थान नहीं है। आज की रात यदि सिर्फ मेरा शरीर ही हासिल करना है तो आप कर सकते हैं... मगर आप का यह कृत्य मेरे लिए बलात्कार ही होगा। मैं दिल से इस मिलन को कबूल नहीं कर सकती .. बाकी आपकी मर्जी..। मुझे जो कहना था कह दिया ।"..कहकर निशा ने सिर झुका लिया।

यह शब्द पिघले शीशे की तरह राजीव के कानों में पड़े..। उसे दुनिया डोलती से महसूस हुई । कई क्षण तो उसे समझ में ही नहीं आया कि वह क्या कहे..। होंठ सूख गये.. गले में गोला सा अटकने लगा । बड़ी मुश्किल से उसने आंखों में उमड़ते आसुओं को रोका.. खुद पर जब्त किया और बोला.." नहीं ..निशा.. मेरे लिए भी आज की रात का मतलब सिर्फ तुम्हारा शरीर हासिल करना नहीं है। उस शरीर को हासिल करके भी क्या होगा जिसके अंदर धड़कते दिल की किसी धडकन मे मेरा नाम ही नहीं है..!! मुझे तुम्हारा फैसला कबूल है.. तुम्हारी खुशी से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं ।।..विश्वास रखना.. जो तुम चाहती हो वही होगा ..मैं कभी तुम्हारे करीब आने की कोशिश नहीं करुंगा ।।"

एक क्षण को चुप की छाई रही।.. राजीव ने पलंग के सिरहाने रखा तकिया उठाया...पलंग का घेरा काटकर दूसरी ओर पहुंचा.. और निशा की ओर पीठ करके लेटते हुए बोला..." तुम भी थक गई होगी.. सो जाओ..।।"
निशा ने भी चुपचाप उसकी ओर पीठ फेर ली और लेट गयी।
कमरे में ac चलता रहा ।.. मगर ..एक सुलगते रिश्ते की तासीर कमरे से भी अधिक ठंडी हो रही थी।
सुहाग सेज पर सजे फूल फिजा को महकाते रहे ।.. मगर उल्फत और समर्पण का महकता रिश्ता.. अपनी खुशबू खो रहा था..।।

"मिलन" की रैना बीती ..।। आफताब ने फिर से अपने नूर से दुनिया को रोशन किया मगर राजीव के वैवाहिक जीवन की काली रात तो जाने कितनी लंबी थी..।। उसकी हसरतो का सूरज तो शायद हमेशा के लिए डूब चुका था..!!
राजीव ने अपने दिल का दर्द किसी पर भी जाहिर नही किया। हर किसी के सामने यु जाहिर करता मानो उसका वैवाहिक जीवन बेहद सुखद है। दिन में सबके सामने वह एक आम पति की तरह व्यवहार करता .. और रात में दोनों एक ही पलंग पर इस तरह सो जाते ..मानो ट्रेन में आमने-सामने की बर्थ पर दो अनजान मुसाफिर..।।
जाने किस्मत ने उनके लिए क्या सोच रखा था..!!

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